बीजेपी कहूं या नमो, खैर अब तो बात एक ही है और मेरे ख्याल से एक अच्छा संकेत भी, क्योकि कोई लाख संसदीय समीति बना ले, सत्ता का ध्रुवीकरण न होने दे, लोकतंत्र का हवाला दे पर कहीं न कहीं ये हानिकारक होता है, और विशेषकर तब जब कोई ऐसा निर्णय लेना हो जो पार्टी के हित में भी हो सकता है और उसके अहित में भी, पार्टी के हित में हो और कुछ बड़े नेताओ के अहित में, खैर अब बीजेपी के लिए ये मुद्दा या परेशानी का सबब नही है, क्युकि जाने अनजाने में सत्ता का केन्द्रीयकरण हो चूका है, भले से ये केवल चुनाव तक हो, और अगर सब कुछ सही रहा तो अगले पांच सालो तक।
आज हर कोई नमो का जाप कर रहा है चाहे वो कोई बड़ा नेता हो या रिक्शा चलाने वाला मजदुर, बड़ा नेता इसलिए कि चुनाव बाद कोई अच्छा सा मंत्रालय मिल जाये और रिक्शावाला इसलिए कि उसे अब सूरत नही जाना पड़ेगा काम कि तलाश में, अब वो यहीं अपने बीबी बच्चो के साथ रहेगा और मोदी जी उनको कोई ना कोई रोजगार दिला ही देंगे , एक और वर्ग है जो केवल हिन्दू है और उसकी प्रसन्नता मोदी के आने से बहुत बढ़ी है, तो कुल मिला के एक अच्छी खासी जनसँख्या मोदी के पीछे खड़ी है, अब ना कोई चमार है ना ठाकुर वो बस हिन्दू है, हा यादव अभी भी यादव है और वो साइकिल छोड़ के कहीं नहीं जाने वाला, परन्तु हाल के कुछ दिनों से जनता का मन विचलित होते हुए देखा मैंने मोदी जी के प्रति, कारण कई हैं, मोदी जी का वही रटा रटाया भाषण, भाइयो और बहनो और ऐसी भीड़ कभी नहीं देखी इत्यादि इत्यादि,क्या है कि आज कि जनता को चैनल बदलने का शौक सा हो गया है, वो एक ही समाचार १० चॅनल्स पे बदल बदल के देखता है, अब वो केवल शनिवार और रविवार को सिनेमा नहीं देखता, जब मन चाहे चैनल बदल के देख सकता है, पर मोदी जी का चैनल है कि बदल ही नहीं रहा, जनता उनको देखना चाहती है, मंच पे बैठे मोदी को नहीं अपने पास से गुजरते हुए मोदी को, उनके करीब जाने कि जरुरत है अब, सभाएं बहुत हो गयी, जनता का उत्साह चौगुना हो जायेगा,और अगर केवल भाषणो का दौर चलता रहा तो हो सकता है जनता थोड़ी सी रूठ जाये और चुनाव वाले दिन हाथी, साइकिल पे बैठ के वोट दे आये, क्युकि पूरी भीड़ कभी मतदाता नही होता, उन्हें मतदाता बनाना पड़ता है जो कि नहीं किया जा रहा है, मै कुछ ऐसे लोगो से मिला जिन्हे ये तो पता है कि मोदी को वोट देना है पर ये नहीं पता वो बीजेपी से हैं और उनका चुनाव चिन्ह क्या है, और इस बावत जमीनी कार्यकर्ताओ को आगे लाना होगा उनमे उत्साह भरना होगा, क्यूंकि अधिकतर कार्यकर्त्ता टिकट बँटवारे से पहले से ही नाराज बैठे हैं।
ये तो रही तैयारियो कि बात , अब बात करते है नीतियो कि, हालाँकि मोदी का कद बढ़ा है दिल्ली में पर उन्हें ये भी सोचना चाहिए ये गुजरात नहीं है , शुरू के कुछ दिनों के लिए तो कतई नहीं, अडवाणी जी को नाराज करना, यशवंत सिंह , सुषमा जी को अनदेखा करना, हालाँकि ये एक गणित के तहत हो रहा है जिसके शिरोधार्य माननीय राजनाथ जी हैं, वो चुनाव से पहले हर नेता को इतना छोटा कर देना चाहते है कि अगर चुनाव के बाद उन्नीस बीस हो तो सिंघासन पर वो ही बिराजें, और वो दिन बीजेपी के लिए बहुत ही बुरा होगा क्यूंकि राजनाथ जी कभी स्थायी सरकार नहीं दे सकते, और इस बार जो बीजेपी गयी तो फिर आना मुश्किल ही है, मोदी अगर आज अडवाणी जी को भरोसे में ले ले और उनकी अच्छी विदाई के लिए अगले चुनाव में राष्ट्रपति के लिए नाम अग्रसर कर दें, इससे अच्छी विदाई उनकी हो ही नहीं सकती, क्यूंकि बीजेपी में एक अडवाणी जी ही ऐसे नेता है जिन्होने हर परिस्थिति देखी है और उनमे ही ये माद्दा है जो २७२ के आंकड़े को पा सकते हैं , मोदी जी के लिए जनता में उत्साह बहुत है पर उन्हें मतदाता बनाने के लिए एक सुनियोजित रणनीति कि जरुरत है जो उनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता और अगर सब कुछ अब भी सही से शुरू हो जाये तो २७२ अकेले बीजेपी ला सकती है, किसी पार्टी कि उसे जरुरत ही नहीं है, पर ये रोज बढ़ता कुनबा एक परेशानी का सबब है क्यूंकि अगर मोदी इन सबको ले के प्रधानमंत्री बन भी जाते हैं तो वो उस तरीके से कम नहीं कर पाएंगे जो उनका तरीका है और जनता को उनसे आशाये बहुत हैं बाकी जो है सो हइये है
nice analysis..
ReplyDeleteThanks Rahul
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